Sunday, September 7, 2008

बिहार में बाढ़

बाढ़ जरुरी है...
आजकल पूरा उत्तरी बिहार बाढ़ की चपेट में है...चारों ओर कोहराम मचा है ...लगता है जैसे कोसी मैया सबकुछ अपने में समा लेना चाहती है...कितने मरे कितने कितने बचे हैं किसी को ठीकठाक पता नहीं है...बाढ़ की विकराल हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सूबे के मुख्यमंत्री ने जब बाढ़ क्षेत्रों का दौरा किया तो उनके मुंह से अनायास ही निकल गया कि ये बाढ़ नहीं प्रलय है.... सरकार के लिए अभी सबसे बड़ी चिंता है कि बाढ़ में फंसे लोगों को सुरक्षित ठिकानों तक कैसे पहुंचाया जाए...राहत पहुंचाने के काम में राज्य सरकार के नुमाइंदों के साथ साथ सेना के तीनों अंग भी जीजान से जुटे हुए हैं ...केंद्र सरकार ने बाढ़ राहत के नाम पर एक हजार करोड़ की फौरी सहायता की घोषणा कर चुकी है...खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बाढ़ से घिरे इलाके का दौरा कर चुके है...बाढ़ की विभीषिका देख कर मनमोहन सिंह ने सबा लाख टन अनाज देने की भी घोषणा की है...कई राज्य सरकारों ने भी अपने अपने तरीके से सहायता की पेशकश की है...हर कोई इस महाविपदा की घड़ी में जैसे बन पा रहा है सहायता कर रहा है...हर साल उत्तरी बिहार में बाढ़ आता पर आज तक इसके रोकथाम की कोई स्थाई उपाय नहीं किए जा सके हैं...मजेदार बात ये भी है कि जिस बिहार ने कई आंदोलनों को जन्म दिया है वहां कभी बाढ़ की रोकथाम के लिए जनता की ओर से कोई आंदोलन नहीं किया गया है...ये वही बिहार है जहां अपने अपने दलों को जीताने के लिए के लिए लोग लड़ने मरने को लोग तैयार रहते हैं...मगर आज तक किसी ने भी बाढ़ की समस्या के समधान के लिए सरकार को घेरने की कोशिश नहीं की है...ज्यादातर लोग बाढ़ को बिहार की नियति मान चुके हैं और इसी में जीने की आदत डाल चुके हैं ...ऐसे लोगों सहायता कौन कर सकता है जो खुद अपनी सहायता करने को तैयार नहीं हैं.....खैर अभी ढ़ोल पीटने का सही समय नहीं है ...वक्त का तकाजा है कि लोगों को जल्द से जल्द राहत पहुंचाई जाए...राहत का दौर चल ही रहा है और साथ ही राजनीति भी चल रही है...राज्य सरकार का आरोप है कि बाढ़ आने से पहले ही केन्द्र सरकार को बता दिया था कि कोसी के तटबंध को खतरा है...पर समय रहते केन्द्र सरकार ने मदद नहीं किया जिससे हालात खराब हो गए...कोसी नदी का तटबंध टूटा 18 अगस्त को और देखते ही देखते उत्तरी बिहार के 14 जिलों को अपने आगोश मे ले लिया ...दरअसल 8 अगस्त को ही कोसी तटबंध में दरार पड़ गया था...राज्य सरकार ने तुरंत ही इंजीनियरों की एक टीम भेजकर इस दरार को दुरुस्त करवा दिया ...पर नेपाल की सीमा पर रहने वाले नेपाली लोगों ने इनके साथ सहयोग नहीं किया ...नतीजा तटबंध की मरम्मत पूरी तरह से नहीं हो पाया...दस दिनों बाद ही कोसी ने अपना कहर दिखा दिया ...जिसकी चेतावनी हर साल दी जाती है...इस बार तो कोसी मैया हद कर दी ....कह जा रहा है कि कोसी तटबंध को तोड़कर अपनी धारा बदल दी है ...करीब दो सौ साल पहले जहां कोसी नदी बहती थी आज उसी धारा में बह रही है...हालात बद से बदतर होती जा रही है...कई ऐसे इलाके भी इस साल बाढ़ की चपेट में आ गए हैं...जहां पहले बाढ़ नहीं आता था...एक तरफ बाढ़ से लोग मर रहें हैं तो दूसरी ओर कुछ लोग बाढ़ के खेल का मजा लेने की व्यूहरचना कर रहें हैं...एक ओर कोसी की धारा बह रही है तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार की गंगा भी बहने लगी है ...ये अलग बात है कि इसका पता तो शायद बाद में चलेगा कि कितने गौतम गोस्वामी इस बार करोड़पति बनते हैं ...पर राहत कार्यों को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि मंत्री हों या सरकारी अमले कोई भी इस सुनहरे मौके को हाथ से जाने देना नहीं चाहते ...बादे तो बड़े बड़े किए जा रहें हैं ...पर नतीजा वही ढाक के तीन पात...खैर इन सबके बीच जो एक बहुत ही अच्छी चीज उभरकर सामने आई है वह है ...बाढ़ से घिरे लोगों में गजब की एकता देखी जा सकती है ...ये वही बिहार है जहां चुनाव के समय लोग जाति और धर्म के नाम पर एक दूसरे का खून कर देने से भी नहीं हिचकिचाते ...वहीं आज सभी एकजुट होकर एक दूसरे की मदद कर रहें हैं...बाढ़ में डूब रहे लोगों से आज कोई उसकी जाति और धर्म नहीं पूछ रहा है...बस डूब रहे लोगों को बचाना ही सबका धर्म बन गया है...चलिए कुछ तो सही हो रहा है जो हमारे देश के नेता नहीं कर पा रहें हैं वह बाढ़ ने ही कर दिखाया...यह देखकर मन करता है कि बिहार में बाढ़ जरुरी है ...सबकुछ छीनकर भी बाढ एक ऐसी चीज बिहार वासियों को देकर जाती है जिसकी जरुरत सबसे ज्यादा है...वह है समाज में एका की भावना ...अगर हमारा समाज जाति ,धर्म , ऊंच नीच भूलकर बिहार के विकास की बात सोचने लगे तो शायद किसी भी समस्या का स्थाई समाधान संभव है....