बाढ़ जरुरी है...
आजकल पूरा उत्तरी बिहार बाढ़ की चपेट में है...चारों ओर कोहराम मचा है ...लगता है जैसे कोसी मैया सबकुछ अपने में समा लेना चाहती है...कितने मरे कितने कितने बचे हैं किसी को ठीकठाक पता नहीं है...बाढ़ की विकराल हालात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सूबे के मुख्यमंत्री ने जब बाढ़ क्षेत्रों का दौरा किया तो उनके मुंह से अनायास ही निकल गया कि ये बाढ़ नहीं प्रलय है.... सरकार के लिए अभी सबसे बड़ी चिंता है कि बाढ़ में फंसे लोगों को सुरक्षित ठिकानों तक कैसे पहुंचाया जाए...राहत पहुंचाने के काम में राज्य सरकार के नुमाइंदों के साथ साथ सेना के तीनों अंग भी जीजान से जुटे हुए हैं ...केंद्र सरकार ने बाढ़ राहत के नाम पर एक हजार करोड़ की फौरी सहायता की घोषणा कर चुकी है...खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बाढ़ से घिरे इलाके का दौरा कर चुके है...बाढ़ की विभीषिका देख कर मनमोहन सिंह ने सबा लाख टन अनाज देने की भी घोषणा की है...कई राज्य सरकारों ने भी अपने अपने तरीके से सहायता की पेशकश की है...हर कोई इस महाविपदा की घड़ी में जैसे बन पा रहा है सहायता कर रहा है...हर साल उत्तरी बिहार में बाढ़ आता पर आज तक इसके रोकथाम की कोई स्थाई उपाय नहीं किए जा सके हैं...मजेदार बात ये भी है कि जिस बिहार ने कई आंदोलनों को जन्म दिया है वहां कभी बाढ़ की रोकथाम के लिए जनता की ओर से कोई आंदोलन नहीं किया गया है...ये वही बिहार है जहां अपने अपने दलों को जीताने के लिए के लिए लोग लड़ने मरने को लोग तैयार रहते हैं...मगर आज तक किसी ने भी बाढ़ की समस्या के समधान के लिए सरकार को घेरने की कोशिश नहीं की है...ज्यादातर लोग बाढ़ को बिहार की नियति मान चुके हैं और इसी में जीने की आदत डाल चुके हैं ...ऐसे लोगों सहायता कौन कर सकता है जो खुद अपनी सहायता करने को तैयार नहीं हैं.....खैर अभी ढ़ोल पीटने का सही समय नहीं है ...वक्त का तकाजा है कि लोगों को जल्द से जल्द राहत पहुंचाई जाए...राहत का दौर चल ही रहा है और साथ ही राजनीति भी चल रही है...राज्य सरकार का आरोप है कि बाढ़ आने से पहले ही केन्द्र सरकार को बता दिया था कि कोसी के तटबंध को खतरा है...पर समय रहते केन्द्र सरकार ने मदद नहीं किया जिससे हालात खराब हो गए...कोसी नदी का तटबंध टूटा 18 अगस्त को और देखते ही देखते उत्तरी बिहार के 14 जिलों को अपने आगोश मे ले लिया ...दरअसल 8 अगस्त को ही कोसी तटबंध में दरार पड़ गया था...राज्य सरकार ने तुरंत ही इंजीनियरों की एक टीम भेजकर इस दरार को दुरुस्त करवा दिया ...पर नेपाल की सीमा पर रहने वाले नेपाली लोगों ने इनके साथ सहयोग नहीं किया ...नतीजा तटबंध की मरम्मत पूरी तरह से नहीं हो पाया...दस दिनों बाद ही कोसी ने अपना कहर दिखा दिया ...जिसकी चेतावनी हर साल दी जाती है...इस बार तो कोसी मैया हद कर दी ....कह जा रहा है कि कोसी तटबंध को तोड़कर अपनी धारा बदल दी है ...करीब दो सौ साल पहले जहां कोसी नदी बहती थी आज उसी धारा में बह रही है...हालात बद से बदतर होती जा रही है...कई ऐसे इलाके भी इस साल बाढ़ की चपेट में आ गए हैं...जहां पहले बाढ़ नहीं आता था...एक तरफ बाढ़ से लोग मर रहें हैं तो दूसरी ओर कुछ लोग बाढ़ के खेल का मजा लेने की व्यूहरचना कर रहें हैं...एक ओर कोसी की धारा बह रही है तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार की गंगा भी बहने लगी है ...ये अलग बात है कि इसका पता तो शायद बाद में चलेगा कि कितने गौतम गोस्वामी इस बार करोड़पति बनते हैं ...पर राहत कार्यों को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि मंत्री हों या सरकारी अमले कोई भी इस सुनहरे मौके को हाथ से जाने देना नहीं चाहते ...बादे तो बड़े बड़े किए जा रहें हैं ...पर नतीजा वही ढाक के तीन पात...खैर इन सबके बीच जो एक बहुत ही अच्छी चीज उभरकर सामने आई है वह है ...बाढ़ से घिरे लोगों में गजब की एकता देखी जा सकती है ...ये वही बिहार है जहां चुनाव के समय लोग जाति और धर्म के नाम पर एक दूसरे का खून कर देने से भी नहीं हिचकिचाते ...वहीं आज सभी एकजुट होकर एक दूसरे की मदद कर रहें हैं...बाढ़ में डूब रहे लोगों से आज कोई उसकी जाति और धर्म नहीं पूछ रहा है...बस डूब रहे लोगों को बचाना ही सबका धर्म बन गया है...चलिए कुछ तो सही हो रहा है जो हमारे देश के नेता नहीं कर पा रहें हैं वह बाढ़ ने ही कर दिखाया...यह देखकर मन करता है कि बिहार में बाढ़ जरुरी है ...सबकुछ छीनकर भी बाढ एक ऐसी चीज बिहार वासियों को देकर जाती है जिसकी जरुरत सबसे ज्यादा है...वह है समाज में एका की भावना ...अगर हमारा समाज जाति ,धर्म , ऊंच नीच भूलकर बिहार के विकास की बात सोचने लगे तो शायद किसी भी समस्या का स्थाई समाधान संभव है....
Sunday, September 7, 2008
Friday, June 27, 2008
1983 के हीरो
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में 25 जून 1983 का दिन सुनहरे पन्ने में दर्ज है...इस दिन भारत ने वेस्ट इंडिज को वल्र्ड कप फाइनल में पटकनी देकर क्रिक्रेट की दुनिया में उसकी बादशाहत को चुनौती दी थी...वैसे तो पूरे टुर्नामेंट के दौरान हर खिलाड़ी ने अपना किरदार बखूबी निभाया था ..पर कुछ नाम ऐसे हैं जिनके बगैर विश्व विजेता बनने की राह आसान नहीं थी...आइए टीम इंडिया को वल्र्ड चैंपियन बनवाने में अहम भूिमका निभाने वाले पांच स्टार क्रिक्रेटरों के परफॉर्मेंस पर नजर डालते हैं ...सबसे पहले बात कपिलदेव की ...कपिल ने अपनी कप्तानी और हरफनमौला खेल से सबका दिल जीत लिया था ...उन्होने अपनी टीम के लिए संकटमोचन की भूमिका निभाई थी..जिंबाब्वे के खिलाफ उनकी 175 रन की पारी का तो हर कोई कायल है ...अकेले दम पर कपिल ने भारतीय टीम की नैया पार लगाई थी ...और इस पारी के लिए कपिल मैन ऑफ दी मैच भी चुने गए थे... कपिल ने 60.60 के औसत और 109 के स्ट्राइक रेट से भारत के लिए सबसे अधिक 303 रन बनाए थे ..गेंदबाजी में 20.41 के औसत से 12 विकेट भी उनके खाते में दर्ज है ..इतना ही नहीं उन्होने सात कैच भी लपके थे ...जिसमें विवियन रिचर्डस का वो शानदार कैच भी शामिल था जो फाइनल मैच का टर्निग पॉइंट साबित हुआ ...कपिल ने खुद के प्रदर्शन से साथी खिलाड़ियों के लिए एक मिसाल कायम की थी ... ....स्टार खिलाड़ियों में दूसरा नाम है मोहिंदर अमरनाथ का ...फाइनल और सेमिफाइनल दोनो में मैन ऑफ द मैच रहे थे अमरनाथ ...सेमिफाइनल में इंगलैंड के खिलाफ बहुमूल्य 46 रन बनाए थे और साथ ही दो अहम विकेट भी लिए थे ....फाइनल में वेस्ट इंडिज के खिलाफ उन्होने अपन ऑलराउंड खेल से भारत को विश्व विजेता बनाने में अहम किरदार निभाया था ...जिसमें बेशकीमती 26 रन और तीन विकेट भी शामिल हैं..अमरनाथ ने 30 की औसत से 237 रन बनाए जिसमें 80 रन उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा था...गेंदबाजी में उन्होने 22.25 की औसत से आठ विकेट चटकाए थे.... ......एक और होनहार हरफनमौला खिलाड़ी हैं मदन लाल ...जिंबाब्वे के खिलाफ अपनी घातक गेंदबाजी से इस खिलाड़ी ने भारत को जीत दिला दी ....इस मैच में किफाइती बॉलिंग करते हुए मदन लाल ने तीन कीमती विकेट चटकाए ..इस मैच में मैन ऑफ द मैच रहे मदन लाल ने कई बार अपनी उपयोगिता साबित की ...और बल्लेबाजी में भी जब मदन को मौका मिला उन्होन अपना हुनर दिखाया ..गेंदबाजी में 16.76 के औसत से मदन ने 17 विकेट झटके ...जबकि बल्लेबाजी में 34 के औसत से 102 रन बनाए थे ......अब बात यशपाल शर्मा की जिसने पहले मैच में अपन बल्ले का रंग दिखाया था ...विश्व कप 1983 में भारत के सामने पहले ही मैच में उस समय की सर्वश्रेष्ठ टीम यानि कि वेस्ट इंडिज थी....इसी मैच में यशपाल ने बेहतरीन 89 रन की पारी खेली थी ...इस पारी ने ही भारत की जीत की नींव रखी थी ...पूरे विश्व कप टूर्नामेंट के दौरान यशपाल एक भरोसे के बल्लेबाज साबित हुए थे....सेमिफाइनल में भी यशपाल ने 61 रनों की शानदार पारी खेली थी .....पूरे विश्व कप में इनकी बल्लेबाजीका बोलबाला रहा....उन्होने 34.28 के औसत से 240 रन बटोरे .........अब बात एक ऐसे हीरो की जिसने अपने तूफानी गेंदबाजी से विपक्षी बल्लेबाजों को कभी जमने नहीं दिया ......ये हैं रोजर बिन्नी ... भारत की तरफ से सबसे ज्यादा विकेट इसी गेंदबाज के खाते में रहे ...ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ रोजर की घातक गेंदबाजी के आगे ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों ने घुटने टेक दिए थे ...और भारत के लिए सेमिफाइनल का दरवाजा खुल गया ....इस मैच में उन्होने चार विकेट चटकाए ....इसके लिए उन्हे मैन ऑफ द मैच के पुरस्कार से नवाजा गया ....जब भी टीम को विकेट की जरुरत पड़ी कप्तान ने इस गेंदबाज को याद किया ....और रोजर ने भी अपन कप्तान को भरोसे को कभी टूटने नहीं दिया ....18.66 के औसत से रोजर बिन्नी ने कुल 18 विकेट झटके थे ....पूरे टुर्नामेंट के दौरान बिन्नी के इस स्विंग गेंदबाजी के आगे सभी बल्लेबाज जूझते नजर आए ........इन्ही रणवांकुरों ने भारत को विश्व का सरताज बनाया ...इन्हें लख लख सलाम...
Saturday, May 17, 2008
याद तेरी आती है
चले गए तब ज्ञात हुआ , अपना खोना क्या होता है !
याद में तेरे साथी मेरे , घर आंगन भी रोता है !!
वही आंगन ढ़ूढते थे तुम , मै कहीँ छुप जाता था !
कईं सवाल पूछोगे ये , सोच नजर चुराता था !!
बड़े जटिल लगते थे , प्रश्न तेरे सीधे सादे !
लौट के ना आओगे तुम , इस मन को समझाता हूँ !
पर तेरी यादों की दस्तक , हर कोने मे पाता हूँ !!
माना अब हमने तेरे बिन , मुस्कुराना सिख लिया !
वक्त के साथ अकेले ही , कदम मिलाना सिख लिया !!
अगले जनम तुमको इश्वर , फिर हमसे ही मिलवादे !
Thursday, May 1, 2008
एक सराहनीय फैसला
चलिए एक अच्छी शुरूआत हुई....देर से ही सही न्यायालय ने आखिरकार जलसंकट की गंभीरता को समझते हुए एक अच्छा निर्णय सुनाया...दिल्ली हाई कोर्ट ने डीडीए को आदेश दिया है कि वह द्वारका निवासी एक व्यक्ति को रोज पीने के पानी की सप्लाई करे...आदेश पर अमल में कोताही हुई तो कोर्ट तो कोर्ट फिर हस्तक्षेप करेगा....यह आदेश 65 वर्षीय नवल सिंह की याचिका पर दिया गया ....उन्होने कहा था कि गर्मी के इस मौसम मे पीने के लिए पानी नहीं मिल रहा है....... पानी के मुद्दे पर संभवत यह पहला अदालती हस्तक्षेप है...जस्टिस कैलास गंभीर इसके लिए साधुवाद के पात्र हैं .....भोजन और पानी तो हर इंसान का मौलिक अधिकार है....आखिर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 मे वर्णित प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत हर व्यक्ति को भोजन और पानी अवश्यंभावी रूप से मिलना चाहिए ....पर आज तो लगता है जैसे इस चीज की किसी को चिंता ही नहीं है ...वैसे ये काम तो सरकार का है ...पर भारत मे तो हर चीज को न्यायालय के आदेश से ही लागू करने का चलन हो गया है ....अब जनता भी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सरकार की ओर न देखकर अदालत का दरवाजा खटखटाने में ही यकीन करती है...लोगों को पता है देर से ही सही पर न्यायालय से ही कुछ मिल सकता है....सरकार तो सिर्फ वायदे ही करती है .....कितनी अजीब बात है पानी जैसी नितांत अनिवार्य चीज भी अब लोगों को आसानी से उपलब्ध नहीं है .....इससे भी बड़ी बात ये है कि लोग अभी तक चुप है.....आम लोगों के लिए भले ही पानी की कमी है पर बाजार में बड़े आराम से दस रूपये बोतल पानी उपलब्ध है....किसी बड़े विद्वान ने कहा था कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए ही होगा ....उससे पहले कहीं भारत मे पानी के गृहयुद्ध न छिड़ जाए ....समय रहते अगर समाज के ठेकेदार नहीं जागे तो ऐसा भी संभव है.....खैर अभी स्थिति इतनी बदतर नहीं हुई है...पर अब हाथ पर हाथ रखे बैठने का समय भी नहीं है ...जरूरत है हमारे देश मे उपलब्ध जल संसाधन के सही इस्तेमाल की ....इसके लिए सिर्फ सरकार ही नहीं वरन आम लोगों को भी अपनी जिम्मेवारी समझते हुए सही जल प्रबंधन की तकनीक अपनाना चाहिए ....तभी सभी को सुलभता से ये जीवन अमृत मिल सकेगा ......
Wednesday, April 30, 2008
एक और कोशिश
महंगाई एक फिर अपने चरम पर है... सरकार परेशान है... हो भी क्यों नहीं चुनावी वर्ष जो ठहरा... आंकड़े बताते हैं कि मुद्रास्फिती 7.33 प्रतिशत पर है...पर असल महंगाई तो लगता है कि सारे रिकॉर्ड तोड़ देने को बेकरार है...एक बार फिर रिजर्व बैंक ने सी.आर. आर. में बढ़ोतरी कर और सरकार ने वायदा कारोबार पर रोक,
आयात शुल्क में कटौती, निर्यात शुल्क में बढ़ोतरी कर अपनी कर्त्तव्य की पूर्ति कर दी है ..अब चाहे महंगाई घटे या बढे सरकार को क्या फर्क पड़ता है...उसने तो जो करना था कर दिया अब लोगों का भाग्य ....हर बार जब भी महंगाई बढ़ती है...रिजर्व बैंक और सरकार दोनों काफी परेशान हो जाते हैं ...एक मुहिम शुरू होती है...बैंक दर कम किया जाता है...सी.आर.आर. बढाया जाता है...सरकार भी और संसद भी परेशान से दिखने लगते हैं ...लगता है कि इस बार महंगाई जरूर कम हो जाएगी ...पर शायद ही कभी ऐसा हो पाता है...पढे लिखे लोग तो समझ भी जाते हैं कि हां भई सरकार ने तो अपनी ओर से कोशिश कर दी है ...पर सीधे सादे हमारे गांवों के साठ फीसदी कभी समझ भी नहीं पाते कि आखिर सरकार ने महंगाई रोकने के लिए किया क्या...उन्हे तो कभी महंगाई कम होती दिखती नहीं...सरकार आंकडों के खेल में उलझी रहती है और भोलीभाली जनता भगवान के भरोसे बैठी रहती है....खैर इन बातों को जाने दिजिए ....आश्चर्य तो तब होता है जब इतने के बावजूद ज्यादातर लोग चुप ही रहते हैं...आखिर इसका इलाज क्या है ....खाद्यान्न भंडारों में अनाज सड़ रहा है...वहीं दूसरी ओर लोग भूखे मर रहें हैं ...ये क्या है ...किस तरह की व्यवस्था है....आखिर कौन है जिम्मेवार लोगों को राटी देने के लिए...अभी कल की बात है इंडिया गेट पर करीब सौ सांसद जमा हुए ...ये सांसद काफी गंभीर दिख रहे थे....मुद्दा था देश में बच्चों में बढ़ते कुपोषण का ...इस महान कार्य के लिए सभी सांसद दलीय मतभेदों को भुलाकर एक स्वर में बोलते नजर आए ...अगर ये मुहिम जारी रहती है तो कोई कारण नहीं है कि कुपोषण की समस्या पर काबू नही पाया जाए...जरूरत है इस आगाज को अंजाम तक पहुंचाने की ....मगर आज लगभग सभी दल महंगाई के नाम पर सिर्फ राजनीति ही कर रही है...अभी हाल में दिल्ली में कई स्थानों पर एक ही साथ छापेमारी कर हजारों टन अनाज पकड़ा गया ...मगर खास बात यह है कि इसमें किसी की गिरफ्तारी नहीं हुइ...पर सरकार गंभीर है ...आखिर उसने कोशिश तो की ......
आयात शुल्क में कटौती, निर्यात शुल्क में बढ़ोतरी कर अपनी कर्त्तव्य की पूर्ति कर दी है ..अब चाहे महंगाई घटे या बढे सरकार को क्या फर्क पड़ता है...उसने तो जो करना था कर दिया अब लोगों का भाग्य ....हर बार जब भी महंगाई बढ़ती है...रिजर्व बैंक और सरकार दोनों काफी परेशान हो जाते हैं ...एक मुहिम शुरू होती है...बैंक दर कम किया जाता है...सी.आर.आर. बढाया जाता है...सरकार भी और संसद भी परेशान से दिखने लगते हैं ...लगता है कि इस बार महंगाई जरूर कम हो जाएगी ...पर शायद ही कभी ऐसा हो पाता है...पढे लिखे लोग तो समझ भी जाते हैं कि हां भई सरकार ने तो अपनी ओर से कोशिश कर दी है ...पर सीधे सादे हमारे गांवों के साठ फीसदी कभी समझ भी नहीं पाते कि आखिर सरकार ने महंगाई रोकने के लिए किया क्या...उन्हे तो कभी महंगाई कम होती दिखती नहीं...सरकार आंकडों के खेल में उलझी रहती है और भोलीभाली जनता भगवान के भरोसे बैठी रहती है....खैर इन बातों को जाने दिजिए ....आश्चर्य तो तब होता है जब इतने के बावजूद ज्यादातर लोग चुप ही रहते हैं...आखिर इसका इलाज क्या है ....खाद्यान्न भंडारों में अनाज सड़ रहा है...वहीं दूसरी ओर लोग भूखे मर रहें हैं ...ये क्या है ...किस तरह की व्यवस्था है....आखिर कौन है जिम्मेवार लोगों को राटी देने के लिए...अभी कल की बात है इंडिया गेट पर करीब सौ सांसद जमा हुए ...ये सांसद काफी गंभीर दिख रहे थे....मुद्दा था देश में बच्चों में बढ़ते कुपोषण का ...इस महान कार्य के लिए सभी सांसद दलीय मतभेदों को भुलाकर एक स्वर में बोलते नजर आए ...अगर ये मुहिम जारी रहती है तो कोई कारण नहीं है कि कुपोषण की समस्या पर काबू नही पाया जाए...जरूरत है इस आगाज को अंजाम तक पहुंचाने की ....मगर आज लगभग सभी दल महंगाई के नाम पर सिर्फ राजनीति ही कर रही है...अभी हाल में दिल्ली में कई स्थानों पर एक ही साथ छापेमारी कर हजारों टन अनाज पकड़ा गया ...मगर खास बात यह है कि इसमें किसी की गिरफ्तारी नहीं हुइ...पर सरकार गंभीर है ...आखिर उसने कोशिश तो की ......
Wednesday, April 23, 2008
परिचय
मेरा नाम गोपी कृष्ण सहाय है...पेशे से पत्रकार हूं...पत्रकार ....आज पत्रकारिता जगत में ये बहस आम हो चला है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पत्रकारिता के स्तर को नीचे कर दिया है...पर जो लोग इस तरह की बातें करते हैं उनका ध्यान मैं इस ओर खींचना चाहूंगा.....सबसे पहले तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि हर नए विधा को दुनिया में पैर जमाने में वक्त तो लगता ही है....और जहां तक भारत की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बात है तो यह तो अभी अपने शैशवावस्था में है .....अतएव इसे पहले अपने पैरों पर तो खड़ा होने दें फिर करेगे आपनलोग मिलकर समालोचना....यह बात तो सबको पता है कि भारत मे जब अखबार की शुरूआत हुई थी तब कई लोगों की यही राय थी ....खासकर हिन्दी समाचार पत्रों को तो अपने अस्तित्व बचाए रखने के लिए खासा मशक्कत करनी पड़ी थी ॥पर आज भारत की प्रिन्ट मीडिया अपने पैरों पर खड़े होकर खासी विश्बसनियता अर्जित कर चुकी है......आने वाले समय में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी लोगों की अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी...इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके सामने पहले से कोइ उदाहरण नहीं है....ऐसा उदाहरण जो हमारी संस्कृति से मेल खाती हो......ऐसी स्थिति में भारत के वैसे पत्रकार जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम कर रहें हैं वे एक साथ ही छात्र भी हैं और शिक्षक भी ....अर्थात वे खुद भी सीख रहे हैं.....और एक प्रतिमान भी स्थापित करना चाहते हैं ताकि आने वाली पीढी उसका अनुसरण कर सकें... आर एण्ड डी के इस दौर में कई मर्तबा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं जिसे पुरानी पीढ़ी के पत्रकारों के लिए पचाना मुश्किल हो जाता है....जरूरत है उन लोगों को आगे आकर सुधार प्रक्रिया मे हिस्सा लेने की....वरना पत्रकारिता की ये नई पौध उगने से पहले ही मुरझा जाएगी.....
शांति की खोज
यह घटना उन दिनों की है जब सिकंदर महान पूरे विश्व को जीतने की राह पर था ....एक दिन उसने देखा उसके खेमे के बाहर एक आदमी निश्चिंतता पूर्वक सोया हुआ था॥दूसरे दिन भी वह व्यक्ति उसी तरह सोया हुआ था....अब सिकंदर से रहा नहीं गया उसने उस आदमी को जगाने का आदेश दिया .....सिकंदर के सिपाहियों ने तुरंत उसे जगाकर सिकंदर महान के सामने हाजिर किया ....सिकंदर ने उस व्यक्ति से पूछा कि भाई तुम लगातार दो दिनों से क्यों सो रहे हो ......उस व्यक्ति ने सिकंदर से पूछा तुम कौन हो और क्या करते हो ॥सिकंदर ने बताया कि मैं सिकंदर महान हूं और पूरे विश्व को जीतना चाहता हूं......फिर उस व्यक्ति ने पूछा कि उसके बाद क्या करोगे.......तो सिकंदर ने कहा कि उसके बाद आराम करूंगा.......इस पर उस व्यक्ति ने कहा कि मैं भी आराम कर रहा हूं...इस कहानी का सार यह है कि शांति के लिए किसी खास उपलब्धी का इन्तजार बेकार है....आप जैसे भी हैं खुश रहें.....सफलता अपनी जगह है और शांति अपनी जगह....
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