Thursday, June 25, 2009
गंदगी पर हताशा
शीला दीक्षित के इस बयान से बड़ी निराशा हुई जब उन्होने कहा कि यमुना नदी की सफाई संभव नहीं है । यह बयान राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की मुखिया का है । जिनके पास सरकार के सारे संसाधन और प्रशासनिक मशीनरी है । वही जब ऐसा कहेंगी तो आम इंसान तो बिल्कुल हताश हो जाएगा । आखिर जनता ने लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए उन्हें मुख्यमंत्री ये बात सुनने के लिए नहीं बनाया है । बल्की सरकार से ढ़ेर सारी अपेक्षाएं हैं । शीला दीक्षित कहती हैं कि यमुना आज एक नाले में तब्दील हो चुका है । मैं पूछना चाहता हूं कि इसके लिए जिम्मेवार कौन है । पिछले दस सालों में दिल्ली की सरकार ने यमुना की सफाई के नाम पर जितना पैसा बहाया वह कहां गया । आखिर इसका हिसाब कौन देगा । जनता की गाढी कमाई का पैसा यमुना को नाले में तब्दील होने से रोक न सका । इसके लिए कहीं न कहीं सरकार भी दोषी है । ये कह देने से की अभी यमुना की सफाई नहीं हो सकती शीला जी अपनी जिम्मेवारी से बच नहीं सकतीं । मुख्यमंत्री खुद यह मानती हैं कि दिल्ली का 57 फीसदी कचरा यमुना नदी में डाला जाता है ।साथ ही प्रतिदिन तीन हजार लीटर से अधिक सीवर का गंदा पानी भी यमुना में फेंका जाता है । आखिर इन कचरों और गंदे पानी को रोकने की व्यवस्था का उत्तरदारयित्व किस पर है । केवल यमुना को साफ करने की चिंता करने से तो यमुना साफ होने से रही । जरुरत है इसके लिए ठोस कदम उठाने की । यमुना नदी की सफाई की बात छोड़ दें तो शीला सरकार ने दिल्ली को सजाने संवारने में कोई कोर कसर छोड़ नहीं रखी है । फिर क्या वजह है कि यमुना की सफाई संभव नहीं । जो भी सरकारी अधिकारी यमुना एक्शन प्लान के लिए जिम्मेवार है उऩसे इसका जवाब मांगा जाए कि आखिर करोडों अरबों खर्च करने के बाद भी यमुना गंदी ही क्यों है ।इसके साथ ही एक समय सीमा निर्धारित कर इसके सफाई की व्यवस्था की जाए । यमुना की सफाई में जहां भी कोताही बरती जा रही है वहां के अधिकारियों की खबर ली जाए । अगर सरकार गंभीरता से कोशिश करे तो कोई कारण नहीं है कि किसी भी समस्या का समाधान संभव नहीं है । वैसे भी अगले साल दिल्ली मे कॉमनवेल्थ गेम्स होने हैं ऐसे में क्या हम अपने विदेशी अतिथियों का स्वागत गंदी यमुना से करेंगे । ये वक्त है युद्ध स्तर पर काम करने की हताश होने की नहीं ।
Tuesday, June 23, 2009
माओवादियों पर पाबंदी
देर से ही सही आखिरकार केंद्र सरकार ने नक्सली संगठन भाकपा {माओवादी} प्रतिबंधित संगठन की सूची में डालकर एक अच्छा कदम उठाया है । वैसे कोई संगठन जो देश हित और आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बन गया हो उस पर पाबंदी लगनी ही चाहिए । पर क्या किसी संगठन को आतंकी संगठन की सूची में डाल देने से उसपर नियंत्रण किया जा सकता है नहीं । एक और बात मेरी समझ में नहीं आती है कि यह प्रतिबंध पांच साल पहले ही क्यों नहीं लगाया गया जब भाकपा माले और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर 2004 में एक होकर भाकपा माओवादी बन गए। चलिए देर से ही सही सरकार जागी तो सही।अब ये तो समय ही बताएगा कि यह प्रतिबंध कितना कारगर साबित होगा । अब जरुरत है एक ठोस रणनीति बनाने की ।आज भाकपा माओवादी सहित कुछ और नक्सली संगठन केंद्रीय सुरक्षा बलों को सीधी चुनौती देने में लगा है ऐसे उनपर शिकंजा कसने के लिए केवल प्रतिबंध लगाने से काम नहीं चलेगा । किसी भी नक्सली संगठन में नेता लोग बहला फुसला कर भोले भाले लोगों को अपने साथ जोड़ लेते हैं। ये भोले भाले लोग नक्सली नेताओं के मनसूबों को समझ नहीं पाते ।इनके नेताओं को समस्या के समाधान से कोई लेना देना नहीं होता ये तो बस अपनी रोटी सेंकने से मतलब रखते हैं । ऐसे में जरुरत है दो तरह की रणनीति बनाने की । नक्सली नेताओं को गिरफ्तार करें या फिर पुलिस उनकी गोली का जवाब गोली से दे । साथ ही साथ उनके भोले भाले अनुयाय़ियों को समझा बुझा कर संगठन से अलग करने की कोशिश करें । हालांकि यह काम उतना आसान नहीं है । इसके लिए सरकार के इंटेलिजेंस के लोगों को उनके बीच भेजने की आवश्यकता है ।जो भी लोग वहां भेजे जाएँ वो उनके बीच के ही हों । ताकि उन्हें कोई शक नहीं हो ।ज्यादातर लोग अमन और शांति से दो रोटी की तलाश में रहते हैं । खून खराबा कोई नहीं चाहता ।ऐसे में एक सोची समझी पुनर्वास कार्यक्रम चलाकर भोली भाली बहुसंख्यक जनता को इन नक्सलियों के चंगुल से छुड़ाया जा सकता है ।एक खास बात और है सरकार जब भी ऐसा कोई कार्यक्रम बनाए क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही योजना बनाए । क्योंकि पूरे देश के स्तर पर एक योजना नहीं बनाई जा सकती । भले नक्सली आंदोलन के मूल में पिछड़ापन हो मगर जो परिस्थितियां बिहार की है वह आंध्रप्रदेश की नहीं । ऐसे में क्षेत्रीय आधार पर अलग -अलग योजना बनाने की जरुरत है । कोई भी योजना बनाई उसमें केंद्र एवं राज्य स्तर पर समन्वय अति आवश्यक है ।ऐसा नहीं होता है तो केंद्रीय सरका कितनी भी अच्छी योजना बना दे राज्य स्तर पर राजनीति होती रहेगी ।
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