Thursday, May 1, 2008

एक सराहनीय फैसला

चलिए एक अच्छी शुरूआत हुई....देर से ही सही न्यायालय ने आखिरकार जलसंकट की गंभीरता को समझते हुए एक अच्छा निर्णय सुनाया...दिल्ली हाई कोर्ट ने डीडीए को आदेश दिया है कि वह द्वारका निवासी एक व्यक्ति को रोज पीने के पानी की सप्लाई करे...आदेश पर अमल में कोताही हुई तो कोर्ट तो कोर्ट फिर हस्तक्षेप करेगा....यह आदेश 65 वर्षीय नवल सिंह की याचिका पर दिया गया ....उन्होने कहा था कि गर्मी के इस मौसम मे पीने के लिए पानी नहीं मिल रहा है....... पानी के मुद्दे पर संभवत यह पहला अदालती हस्तक्षेप है...जस्टिस कैलास गंभीर इसके लिए साधुवाद के पात्र हैं .....भोजन और पानी तो हर इंसान का मौलिक अधिकार है....आखिर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 मे वर्णित प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत हर व्यक्ति को भोजन और पानी अवश्यंभावी रूप से मिलना चाहिए ....पर आज तो लगता है जैसे इस चीज की किसी को चिंता ही नहीं है ...वैसे ये काम तो सरकार का है ...पर भारत मे तो हर चीज को न्यायालय के आदेश से ही लागू करने का चलन हो गया है ....अब जनता भी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सरकार की ओर न देखकर अदालत का दरवाजा खटखटाने में ही यकीन करती है...लोगों को पता है देर से ही सही पर न्यायालय से ही कुछ मिल सकता है....सरकार तो सिर्फ वायदे ही करती है .....कितनी अजीब बात है पानी जैसी नितांत अनिवार्य चीज भी अब लोगों को आसानी से उपलब्ध नहीं है .....इससे भी बड़ी बात ये है कि लोग अभी तक चुप है.....आम लोगों के लिए भले ही पानी की कमी है पर बाजार में बड़े आराम से दस रूपये बोतल पानी उपलब्ध है....किसी बड़े विद्वान ने कहा था कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए ही होगा ....उससे पहले कहीं भारत मे पानी के गृहयुद्ध न छिड़ जाए ....समय रहते अगर समाज के ठेकेदार नहीं जागे तो ऐसा भी संभव है.....खैर अभी स्थिति इतनी बदतर नहीं हुई है...पर अब हाथ पर हाथ रखे बैठने का समय भी नहीं है ...जरूरत है हमारे देश मे उपलब्ध जल संसाधन के सही इस्तेमाल की ....इसके लिए सिर्फ सरकार ही नहीं वरन आम लोगों को भी अपनी जिम्मेवारी समझते हुए सही जल प्रबंधन की तकनीक अपनाना चाहिए ....तभी सभी को सुलभता से ये जीवन अमृत मिल सकेगा ......

2 comments:

प्रभात रंजन said...

जिन्हे पानी भी मयस्सर नहीं , वे कौन लोग है। जीवन के हाशिए पर सकपकाए से खड़े लोग , जिनकी हुक्मरानों को न तो फिक्र है और ना जरूरत । फैसले आते रहेंगे लेकिन इतना तो वो भी जानते है कि इससे तकदीरें नहीं बदलेगी। जैसी हमारी प्यास वैसी उनकी आंख --- पानी किसी को नसीब नहीं।

Ankit Kashyap said...

बात सिर्फ भोजन या पानी की नहीं है और ना ही बात है किसी एक शख्स की । लेखक की सोच को सलाम करना चाहता हूँ जिन्होने एक ऐसे बिन्दू पर रौशनी डालने की कोशिश की है जिन्हें हम आम जिन्दगी में नजरअंदाज कर देते हैं- और वह है हमारी सोच जो कि बिल्कुल सिमट कर रह गई है। जो काम कानुनन संभव है उसके लिए हम अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं । हम न्याय के इन्तजार में अपना हक भूल रहे हैं । इस लेख में छुपी हुई भावना लेख से ज्यादा महत्वपूर्ण है ।
-अंकित कश्यप